बीकानेर में 40 डिग्री सेल्सियस के कड़े तापमान के बावजूद विदेशी पक्षी कुरजां, लूणकरणसर पहुंच गए हैं। इन पक्षियों ने पश्चिमी मंगोलिया के अल्ताई पर्वतों से उड़ान भरकर, चीन, पामीर, काराकोरम और हिमालयी चोटियों को पार करते हुए करीब 2 हजार किलोमीटर का सफर तय किया है। अब तक करीब 20 हजार कुरजां यहां पहुंच चुके हैं। जीपीएस और टैगिंग से ट्रैक किए जा रहे कुरजां अब मार्च-अप्रैल तक यहीं रहेंगे। टैग किए कुरजां का यहां तय समय पर पहुंचना वैज्ञानिकों के माइग्रेशन अध्ययन के लिए बड़ा रिकॉर्ड माना जा रहा है। कुरजां को 20 साल से अधिक समय से लूणकरणसर माइग्रेट करते हुए देखा जा रहा है। आमतौर पर ये मार्च-अप्रैल में अपने प्रजनन क्षेत्रों की ओर लौटती हैं। इस बार 3 अक्टूबर 2026 को टैग की गई कुरजां का लूणकरनसर पहुंचना अध्ययन के लिए उपयोगी माना जा रहा है। देखें… तस्वीरों में कुरजां
मंगोलिया के अल्ताई से शुरू हुआ सफर पक्षी विशेषज्ञ डॉ. दाऊ बोहरा के अनुसार, ये पक्षी पश्चिमी मंगोलिया के होव्द-उल्गी क्षेत्र के पास से उड़ान भरकर निकले। इसके बाद अल्ताई पर्वतमाला और पूर्वी कजाकिस्तान-पश्चिमी मंगोलिया के क्षेत्र से होते हुए चीन की ओर बढ़े। GPS ट्रैकिंग से इनके लंबे प्रवास का मार्ग सामने आया है। इस साल इन्होंने लगभग 2 हजार किलोमीटर का हवाई सफर तय किया। चीन के शिनजियांग से काशगर तक पहुंचीं मंगोलिया से निकलने के बाद कुरजां चीन के शिनजियांग पहुंचीं। यहां से उरुमची और मध्य शिनजियांग होते हुए दक्षिणी शिनजियांग के काशगर क्षेत्र तक इनकी यात्रा जारी रही। इस दौरान पक्षियों ने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और दुर्गम इलाकों को पार किया। पामीर-काराकोरम और हिमालय पार कर लूणकरणसर पहुंचीं काशगर से आगे कुरजां ने पामीर, काराकोरम और हिमालयी पर्वतीय क्षेत्र को पार किया और उत्तरी भारत में प्रवेश किया। करीब 2 हजार किलोमीटर का सफर तय करने के बाद ये बीकानेर जिले के लूणकरणसर पहुंचीं। यहां झील, जलाशयों और आसपास के खुले मैदान इनके लिए पानी, भोजन और रात में रुकने के लिए उपयुक्त होते हैं। सर्दी में आती हैं, मार्च-अप्रैल में वापस लौटती हैं कुरजां मुख्य रूप से शीतकालीन प्रवास के दौरान लूणकरणसर में रहती हैं। मध्य एशिया में सर्दी शुरू होने पर तापमान तेजी से गिरता है, जिससे ये पक्षी दक्षिण की ओर आती हैं। राजस्थान की अपेक्षाकृत अनुकूल परिस्थितियां इन्हें ऊर्जा जुटाने और सुरक्षित रूप से सर्दी बिताने में मदद करती हैं। बड़ी संख्या में कुरजां के मार्च के अंत तक यहां रहने की संभावना है। सर्दी खत्म होने और तापमान बढ़ने के साथ इनका उत्तर की ओर लौटना शुरू होता है। सामान्यतः मार्च-अप्रैल में ये अपने प्रजनन क्षेत्रों की ओर लौटती हैं। लूणकरणसर में इनका हर साल आगमन 20 साल से ज्यादा समय से देखा जा रहा है। इनके प्रवास पर दिन की लंबाई, मौसम में बदलाव, भोजन-पानी की उपलब्धता और प्रजनन क्षेत्र के मौसम जैसे कई कारकों का असर पड़ता है। टैगिंग से होती है पूरी यात्रा की निगरानी लूणकरणसर की नमक झील और आसपास के खारे-अर्द्धखारे आर्द्र क्षेत्र, तालाब, जलाशय और खुले मैदान कुरजां के लिए महत्वपूर्ण हैं। यहां इन्हें अनाज, बीज, घास, कृषि फसलों के अवशेष और छोटे जीवों के रूप में भोजन मिलता है। ये सर्वाहारी प्रवृत्ति के पक्षी हैं। मंगोलिया में इन पक्षियों को टैग लगाया जाता है, जिससे पता चलता है कि कौन सा पक्षी कहां से निकला और कहां पहुंचा। टैग या GPS/ring वाली कुरजां से वैज्ञानिक प्रवास मार्ग, पड़ाव, गति, दूरी, आवास के इस्तेमाल और वापसी के समय का अध्ययन कर सकते हैं। … ये खबर भी पढ़ें… ब्रीडिंग सेंटर में जन्मे दो गोडावण री-वाइल्डिंग ट्रेनिंग के बाद पहली बार खुले आसमान में उड़े मरुभूमि की पहचान माने जाने वाले राज्य पक्षी गोडावण के अस्तित्व को बचाने की दिशा में रविवार को ऐतिहासिक शुरुआत हुई। रामदेवरा स्थित ब्रीडिंग सेंटर में कृत्रिम तरीके से जन्म लेने और फिर विशेष री-वाइल्डिंग टनल में कुदरती माहौल की ट्रेनिंग पूरी करने वाले दो गोडावणों को पहली बार खुले जंगल में आजाद कर दिया गया। पूरी खबर पढ़िए…
