राजस्थान में पंचायत चुनाव 2026 के पहले चरण में खींवसर के विधायक रेवंतराम डांगा के भतीजे और भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के सांसद राजकुमार रोत के काका (चाचा) को हार का सामना करना पड़ा। वहीं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 21 लाख फॉलोअर्स वाले इन्फ्लुएंसर ओमप्रकाश विश्नोई को भी इंदों की ढाणी में सिर्फ 33 वोट मिले। आखिर दिग्गज नेताओं के परिवार और सोशल मीडिया स्टार गांवों की राजनीति में क्यों चित हो रहे हैं, जनता उन्हें क्यों नकार रही है और क्या है इस सियासी उलटफेर के पीछे का पूरा खेल; यही जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल 1 : चाचा के ‘राज’ में भतीजा और भतीजे के ‘राज’ में चाचा कैसे हारे? जवाब: पहला मामला नागौर के खींवसर विधायक रेवंतराम डांगा से जुड़ा है। डांगा मुंदियाड़ पंचायत के गांव पालड़ी के रहने वाले हैं। उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत 2008 में सरपंच के तौर पर हुई। वे मुंदियाड़ ग्राम पंचायत से सरपंच रहे। 2013 में दोबारा सरपंच बने। 2020 में रेवंतराम की पत्नी गीता देवी पंचायत समिति सदस्य बनीं और मूंडवा प्रधान बनीं। रेवंतराम के पिता बिंजाराम डांगा 5 बार सरपंच रहे। नागौर जिले की मुदियाड़ ग्राम पंचायत से रेवंतराम के भतीजे नरेश डांगा सरपंच का चुनाव 38 वोट से हार गए। उनके सामने 36 साल के सामान्य परिवार से ताल्लुक रखने वाले हनुमान ने 38 वोट से जीत दर्ज की। दूसरा मामला बांसवाड़ा सांसद से जुड़ा है। BAP के राजकुमार रोत पहले चौरासी से विधायक चुने गए थे और अब बांसवाड़ा से सांसद हैं। झोथरी पंचायत समिति की खरवर खुनियां ग्राम पंचायत, जो उनका पैतृक गांव है, वहां उनके चाचा सोहनलाल रोत सरपंच का चुनाव हार गए। दोनों मामलों में पैटर्न एक ही है- विधानसभा और लोकसभा में जाति और पार्टी के बड़े समीकरण चलते हैं। वहीं सरपंच चुनाव में गांव की गुटबाजी, निजी रंजिश और परिवारवाद का विरोध भारी पड़ जाता है। सवाल 2 : 21 लाख फॉलोअर्स वाला कैसे हारा? जवाब: जोधपुर क्षेत्र की इंदों की ढाणी-II ग्राम पंचायत में 1544 मतदाता थे। यहां से सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ओमप्रकाश विश्नोई सरपंच पद के लिए चुनाव लड़े। उनके इंस्टाग्राम पर 14 लाख से ज्यादा और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कुल 21 लाख से अधिक फॉलोअर्स हैं। उन्होंने नशामुक्ति को चुनावी मुद्दा बनाया था। चुनाव के बाद जब वोटों की गिनती हुई तो उन्हें सिर्फ 33 वोट मिले। वजह साफ है- रील पर फॉलोअर यूपी-बिहार-हरियाणा से भी हो सकता है, लेकिन वोट सिर्फ उसी गांव-पंचायत का लगता है। यहां वोट आपके पिछले 5 साल के व्यवहार, जनसंपर्क और जनता के बीच रहने पर मिलता है, कंटेंट या रील्स पर नहीं। सवाल 3 : नेता अपने बेटों को सरपंच क्यों बनाना चाहते हैं? क्या ये अगली पीढ़ी को लॉन्च करने की तैयारी है? जवाब: हां, ये सीधे तौर पर अगली पीढ़ी को छोटे स्तर से लॉन्च करने की उनकी स्ट्रेटजी का हिस्सा है। सबसे बड़ा उदाहरण कोटा का है। सांगोद पंचायत समिति की कुंदनपुर ग्राम पंचायत से पूर्व मंत्री भरत सिंह के पुत्र गंगा सिंह सरपंच चुने गए। उन्होंने 778 वोट से जीत हासिल की। भरत सिंह खुद कुंदनपुर के तीन बार सरपंच रहे, 10 साल प्रधान रहे, फिर विधायक और पंचायतीराज मंत्री बने थे। उनके दादा जुझार सिंह भी मंत्री रहे। अब तीसरी पीढ़ी गंगा सिंह के राजनीतिक करियर की शुरुआत सरपंच से हो गई है। हालांकि परिवार का कहना है कि ग्रामीणों की जिद पर चुनाव मैदान में उतारा गया है। राजस्थान में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, विधानसभा नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, पूर्व मंत्री हेमाराम चौधरी, अमराराम जैसे कई नेता सरपंच, जिला प्रमुख से ही सीएम, सांसद, मंत्री तक पहुंचे हैं। इसलिए नेता चाहते हैं कि बेटा सीधे विधायक का चुनाव न लड़कर पहले सरपंच बने। गांव की नाली, सड़क, पट्टा समझे, ताकि उसके लिए राह आसान हो सके। फिर बड़े स्तर की राजनीति में आए। सवाल 4 : अपना गांव ही क्यों नहीं जीत पाते बड़े नेता? जवाब: वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा के मुताबिक इसके 4 बड़े संभावित कारण हो सकते हैं। 1. एंटी-इन्कम्बेंसी – विधायक 5 साल क्षेत्र में रहता है, लेकिन गांव वाले हर रोज देखते हैं। सड़क नहीं बनी, ट्रांसफार्मर नहीं लगा तो गुस्सा सबसे पहले उनके परिवार के सदस्यों पर इन चुनावों में ही निकलता है। 2. पार्टी सिंबल नहीं – विधानसभा में भाजपा-कांग्रेस-BAP का सिंबल देखकर वोट पड़ते हैं, लेकिन सरपंच में काका-बाबा का झगड़ा और 2 बीघा जमीन का विवाद और लोगों से दूरी भारी पड़ती है। 3. परिवारवाद का विरोध – कई गांवों में युवा पीढ़ी अब अक्सर कहती नजर आती है कि एक परिवार से एक व्यक्ति को मौका देने के बजाय गांव या पंचायत के किसी दूसरे व्यक्ति को आगे बढ़ाना चाहिए। 4. वोटर प्रैक्टिकल है – सांसद के चाचा को हराने वाले वोटर को पता है कि सांसद तो सांसद रहेगा, लेकिन सरपंच ऐसा चाहिए जो सुबह 6 बजे फोन उठा ले। या फिर गांव में कोई भी दिक्कत हो तो वो तुरंत उनकी मदद के लिए उपलब्ध रहे। सवाल 5 : क्या ये हार बड़े नेताओं के लिए खतरे की घंटी है? जवाब: कुछ हद तक हां, बिल्कुल खतरे की घंटी है। राजस्थान में इतिहास कहता है – जो नेता अपनी पंचायत हारता है, वो अगले विधानसभा चुनाव में 50% तक कमजोर हो जाता है। वजह – सरपंच चुनाव में 1600 वोटर होते हैं और सभी वोटर विधायक को निजी तौर पर जानते हैं। अगर 1600 में से 800 भी आपके परिवार के खिलाफ हैं, तो इसका मतलब 1 लाख वोट वाली विधानसभा में भीतर ही भीतर नाराजगी है। इसका असर हालांकि कई जगहों पर पंचायत चुनावों में दिखा है, लेकिन यही वोटर और चुनाव नतीजों के बाद का मैसेज बाकी क्षेत्र में भी नरेटिव बनाता है। जो अगले चुनावों में उस नेता के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है। … यह खबर भी पढ़ें… मिठाई पर चांदी नहीं ‘जहर’:लैब टेस्ट में 99% वर्क नकली, चांदी में एल्युमिनियम और सोने में तांबा-जिंक; लिवर-किडनी खराब होने का खतरा राजस्थान में काजू कतली, बर्फी जैसी मिठाइयों पर लगने वाले चांदी और सोने के वर्क एल्युमिनियम और तांबे से तैयार हो रहे हैं। वहीं एल्युमिनियम जिसे खाने से लिवर-किडनी खराब हो सकती है। कैंसर का खतरा पैदा हो सकता है। दैनिक भास्कर ने ये सच सामने लाने के लिए 15 दिन पड़ताल की। (पूरी खबर पढ़ें)
