नमस्कार, फूलों को लेकर माननीय सांसद महोदय की कथनी और करनी में फर्क नजर आया। दौसा के महवा में महिलाओं ने नाच-गाकर मंत्रीजी से कार से उतरने का निवेदन किया। भीलवाड़ा में जीत के बाद सरपंच साहब जी-भरकर रोये और जयपुर के सामोद में चला चेकिंग अभियान। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. सांसद महोदय की ‘फूल’ वाली बात उर्दू के मशहूर शायर मखदूम मुहिउद्दीन साहब ने खूबसूरत गजल लिखी-फिर छिड़ी रात बात फूलों की। हालांकि फूलों की बात यहां सियासी है। बोतल निशान पार्टी के सांसद महोदय समर्थकों को संबोधित करते हुए फूलों पर व्याख्यान दे रहे थे। वे कह रहे थे- हमारे यहां फूल यूं फेंके जाते हैं जैसे पत्थर फेंकते हैं। आदमी मरे नहीं, लेकिन आंखें तो फूट ही जाएं। मैं तो बचता- बचता आता हूं। सभा में ठहाके लग रहे थे। सांसद महोदय बोले जा रहे थे। आगे बोले-हर किसी के हाथ में फूल। ऊपर से भी फूल बरस रहे हैं और नीचे से फूल धैं-धैं। मारना चाहते हो क्या? इसके बाद सांसद फूल बरसाने की नई परंपरा की बात करने लगे। बोले- नेता को जेसीबी के नीचे ले लेते हो दोनों तरफ से। आगे से भी फूल फेंकते हो ताकि बचाव का कोई रास्ता ही न रहे। भई क्यों मार रहे हो अपने नेता को? सांसद जी ने सलाह दी- प्यार करो तो थोड़े से फूल फेंक दो। मैं फूल से राजी नहीं हूं। मैं तो वोटों से राजी होता हूं। फूल तो मैं ही बरसा दूंगा तुम्हारे ऊपर। नेताजी की बात पर खूब ठहाके भी लगे और तालियां भी बजीं। वैसे नेताजी का बाड़मेर का वीडियो भी सोशल मीडिया पर काफी घूम रहा है। वे कार की रूफ विंडो से निकलकर खड़े हैं। समर्थक नारेबाजी कर रहे हैं। आगे-पीछे हुजूम है। फूल बरसाने के लिए जेसीबी का इंतजाम है, लेकिन फूल बरस नहीं रहे। सांसद जी ने इशारा करके याद दिलाया कि फूल बरसाओ फूल। इसके बाद फूलों की बारिश होने लगी। 2. जीतने के बाद रोने लगे सरपंच साहब पंचायत के चुनाव चल रहे हैं। पंच-सरपंच के रिजल्ट आए। कहीं खुशी कहीं गम वाला मौसम चल रहा है। भीलवाड़ा जिले में जहाजपुर की एक ग्राम पंचायत है- खेड़ी दातड़ा। यहां से बलवीर सेन सरपंच चुने गए। जीतने के बाद मामला भाव-विभोरता की पराकाष्ठा तक जा पहुंचा। सरपंच साहब रोते-रोते घर पहुंचे। घर के स्वर्गवासी बुजुर्ग की तस्वीर लाई गई। तस्वीर से लिपटकर रोने लगे। गांव वाले दिलासा देने लगे। बोले- इन्हीं का आशीर्वाद है। आशीर्वाद लेकर तस्वीर पीछे सौंप दी गई। माताजी पूजा का थाल लेकर आ गईं। आरती उतारी गई। तिलक किया गया। सरपंच साहब मां से लिपटकर भी खूब रोये। आंसू थे कि रुकने का नाम नहीं नहीं ले रहे थे। फिर साहब ने वहीं सभा को संबोधित करना शुरू कर दिया। भरे गले से बोले- चुनाव जीतने की मेरी कोई औकात नहीं थी। मुझे देवताओं का और आप जनता जनार्दन का आशीर्वाद मिला। मैं आपके लिए जी-प्राण से काम करूंगा। पूरी मेहनत करूंगा। मेरे लिए जो कुछ हो वो आप हो। जयकारा लगाने की बारी आई तो सरपंच साहब ने काकाओं की जय, काकियों की जय, भ्राताओं की जय, भाभियों की जय, बाल-गोपाल की जय तक के नारे लगा दिए। सरपंच साहब में अहंकार न आए और वास्तव में अपनी जनता के लिए काम करते रहें तो राजनीति में लंबी पारी खेल सकते हैं। अगर राजनीति का गुमान आ गया, खुद को राजा और जनता को प्रजा समझने लगे, दंभ में घूमने लगे तो किए कराए पर पानी फिरेगा। नेतागण को सरपंच साहब से सीखने की दरकार है, राजनीति में जनता ही जनार्दन है। चुनाव लड़ने वाला कितना ही बड़ा नेता हो, जनता के सामने उसकी कोई हैसियत नहीं, आखिर में वह जनता के सेवक से बढ़कर कुछ नहीं है। 3. पुलिस का ‘चेकिंग अभियान’ भले पुलिस की नाक के नीचे नदी, पहाड़ और जंगल साफ कर दिए जाएं, भले हरियाणा की सुरा सरसराते हुए गुजरात तक पहुंच जाए। लेकिन जब अभियान चलता है तो किसी की खैर नहीं। आदेश ऊपर से आता है तो सख्ती करनी पड़ती है। ऐसी ही सख्ती जयपुर के सामोद थाना के बाहर नजर आई। आदेश थे कि नाकाबंदी कर हर वाहन चेक किया जाए। आदेश वह वाद्य यंत्र है जिसे बजाना ही पड़ता है। तो पुलिसकर्मी आदेश बजाने लगे। थाने के सामने बैरिकेडिंग लगाकर नाका बनाया गया। साहब सड़क पर तैनात हो गए। हर वाहन रुकवाया जाने लगा। साहब हर किसी को डायलॉग से हड़काने लगे। इधर पुलिसवालों के हाथ एक ऐसा ऐप लग गया है जिसमें वाहन की नंबर प्लेट की फोटो खींचकर डालो तो गाड़ी की पूरी जन्म-कुंडली निकल आती है। साहब उसी ऐप के जरिए स्मार्ट वर्किंग करने लगे। अपनी सजगता, कुशलता, वाकपटुता, निर्भीकता, कला-कौशल को वीडियो में सहेजने के लिए एक साथी को मोबाइल पकड़ाया गया था ताकि कालान्तर में वही इन्हीं वीडियो में से छांट-छांटकर रील लायक कंटेंट अपडेट कर सके। इस दौरान एक बाइक पर तीन लड़के बिना हेलमेट गुजरे। उन्हें रोका गया। साहब ने निर्देश जारी किए-इनको बंद कर दो, गाड़ी फर्जी है। किसकी है ये तक इनको पता नहीं है। साहब ने सवालों की झड़ी लगा दी- किसके नाम से गाड़ी है? बाल बड़े क्यों हैं? सूट-बूट पहने हो कौन कह सकता है कि तुम मजदूरी पर जा रहे हो? चोरी करोगे न कहीं जाकर? लड़कों ने प्रश्नों की रफ्तार से ही जवाब दिए- भाई के दोस्त की गाड़ी है। बाल फैशन के हिसाब से हैं। कंपनी में काम करते हैं। अभी आपके पास फोन आ जाएगा। लड़कों से फारिग होकर साहब ने ट्रक रुकवाया। उक्त विधि से ट्रक की जन्म-कुंडली निकाली गई। सीट बेल्ट के लिए हड़काया गया। फिर ईंटों से भरा ट्रैक्टर वहां से गुजरा। साहब गुर्राए- तुम लोग मारोगे क्या किसी को? इतना वजन कंफर्टेबल है क्या? क्या नंबर हैं ट्रैक्टर के? मालिक कौन है इसका? देखो कहां तक भरी है ट्रॉली। बताओ आगे से उठ गया था न ट्रैक्टर? 4. चलते-चलते.. बीते कुछ दिनों से किरोड़ी बाबा साइलेंट हैं। बीमार हो गए थे। बीमारी से पार पाकर एक कॉन्फ्रेंस की थी और पूर्ववर्ती सरकार के भ्रष्टाचार गिनाए थे। मुंह पर मास्क नजर आता है। सेहत में सुधार है लेकिन धार कहीं गायब रही। चेहरा उतरा हुआ सा है। बीमारी का असर देह पर नजर आता है। चीते जैसी चाल और बाज जैसी नजर वाले किरोड़ी बाबा का असल रूप काफी टाइम से नहीं दिखा। युवा नेताजी ने उन्हें ललकारा, तब भी खास रिएक्शन नहीं निकला। सेहत पूरी तरह खरी होने के बाद शायद बाबा के पुराने तेवर लौट आएं। सेहत ऊपर-नीचे होती रहती है लेकिन समर्थकों की दीवानगी चढ़ती ही है, उतरती नहीं। किरोड़ी बाबा दौसा के महवा में थे। कार से निकल रहे थे। दरवाजे पर महिलाओं का रेला दिखा। परंपरागत मीणावाटी गीत गाते हुए महिलाओं ने जबरदस्त डांस किया। गीत के बोल कुछ इस तरह थे कि किरोड़ी बाबा एक बार अपनी गाड़ी से नीचे तो उतर। मंत्रीजी कार से नीचे उतरे और हाथ ऊंचे कर हवा में ताली बजाते हुए महिलाओं की ओर बढ़े। डांस में जोश की लहर दौड़ गई। बाबा की सेहत सुधारने में इस तरह के फैन्स का भी बड़ा योगदान है। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।
