नमस्कार, श्रीगंगानगर के विधायकजी खाने के इतने शौकीन हैं कि नौकरी तक खा सकते हैं। चुनाव में जीतकर जलवा तो सब दिखाते हैं, लेकिन जोधपुर में ज्योतिषी महाराज हारकर भी छा गए और नागौर में रिटायर्ड जज ने पूर्व विधायक को सुना दी खरी-खरी। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. विधायकजी नौकरी खा जाएंगे.. श्रीगंगानगर वाले विधायकजी खुद ही तुकाराम मुंडे बने हुए हैं। खाद्य विभाग की टीम शहर की एक मेवा की दुकान पर पहुंची। दुकानदार विधायकजी का चहेता। त्योहारी सीजन में टीम सैंपल उठाने वाली थी कि विधायकजी पहुंच गए। टीम को दुकान से बाहर कर विधायकजी तुकाराम मुंडे बन गए। एक-एक बर्नी खोलकर खुद ने मेवा चखा और क्लीनचिट दे दी। साथ ही ऑर्डर दिया कि मेरे लिए एक-एक डिब्बा बांध दो। बिल फलां के खाते में लिख लो। विधायकजी सिर्फ खाने के शौकीन नहीं हैं। उन्होंने फूड सेफ्टी विभाग के कर्मचारियों को बता दिया कि मैं नौकरी भी खा सकता हूं। आगे से ध्यान रखा जाए कि खाद्य सुरक्षा टीम कोई सैंपल उठाए तो प्रयोगशाला भिजवाने की जगह विधायकजी के आवास पर भिजवा दे। विधायक ही तय कर लेंगे कि मिलावट है या क्लीन है। विधायकजी सुर्खियों में बने रहते हैं। दो महीने पहले मंच पर इन्होंने आपा खो दिया था। बड़ी मुश्किल से काबू में आए थे। बढ़ती उम्र में इतना जोश खान-पान की विशिष्टताओं के कारण ही रह पाता है। छह महीने पहले तो AEN समेत 3 अफसरों को पटक-पटक कर पीटा था। वो मामला तो चल ही रहा है। कुल मिलाकर आदमी कद्दावर हैं। दुनिया को सीख देते हैं कि जिन्हें लूज मोशन होते हैं वे शंख नहीं बजाया करते। विधायकजी की बात पेट से शुरू होकर पेट पर खत्म होती है। 2. हारकर भी छा गए ज्योतिषी महाराज सोशल मीडिया पर लोग उनकी रील्स के दीवाने हैं। रील्स में वे परात में 6-7 टिक्कड लेकर बैठते हैं। उस पर लोटा भरकर घी डालते हैं। फिर भगोना भर सब्जी डालते हैं। इसके बाद दिखा-दिखाकर खाते हैं। ये जोधपुर के ओसियां इलाके के मशहूर ज्योतिषी ओमप्रकाश बिश्नोई हैं। एक गोशाला भी चलाते हैं। लोगों को भविष्य बताते हैं लेकिन चुनाव में अपना भविष्य नहीं देख पाए। सोशल मीडिया पर इनके 21 लाख से अधिक फॉलोअर्स हैं। लिहाजा इन्हें राजनीतिक सपने आने लगे। सोचा कि सरपंच बनकर गांव की सेवा करूंगा। वे इंदों की ढाणी द्वितीय ग्राम पंचायत के सरपंच पद के लिए चुनावी मैदान में कूद गए। रिजल्ट भी हाथों-हाथ आ गया। उन्हें मात्र 33 वोट मिले। गांव में 1600 वोट थे। ज्योतिषीजी अपना भविष्य भांप नहीं सके। पत्रकार ने सवाल पूछा तो मुस्कुराकर बोले- मुझे 33 करोड़ देवी-देवताओं का आशीर्वाद मिला है। इनमें से 11 तो परिवार के हैं। बस ये पता लग जाए कि वे 22 महान लोग कौन हैं जिन्होंने मुझे अपना अमूल्य वोट दिया। कहकर ओमजी ठहाका मारकर हंसने लगे। अब गांव में जगह-जगह उनका स्वागत सत्कार हो रहा है। पुलिस स्टाफ के लोगों तक ने हार के बाद गले में हार पहनाए। बोले- आप ने हारकर हमारे गांव का नाम दुनिया में रोशन कर दिया। लोगों ने ओमजी को क्यों हराया? इस सवाल का जवाब तो वोटर जानें। फिर भी लोगों को लगा होगा कि सरपंच बनने के बाद भोजन पर बुलाएंगे तो क्या होगा? ज्योतिषी महाराज 8 लोगों का अकेले खा जाएंगे। मजाक की बात एक तरफ। इस चुनाव ने साबित कर दिया कि ऑनलाइन लोकप्रियता और धरातल की लोकप्रियता में जमीन आसमान का अंतर होता है। 3. लाठी के सहारे चुनाव यूं तो जिसकी लाठी उसकी भैंस होती है और लाठी के सहारे चुनाव बहुत प्राचीन और मजबूत विचारधारा है। दिखने में भले पर्चों पर ठप्पे लगते दिखें लेकिन लाठी का अपना महत्व होता है। लेकिन यहां बात लड़ाई झगड़े या बाहुबल की नहीं है। नागौर में कई जगह लाठी के विविध प्रयोग नजर आए। भेरूंदा पंचायत समिति के सथाना कलां पोलिंग बूथ पर बुजुर्गों के लिए व्हीलचेयर की व्यवस्था नहीं थी। ऐसे में बुजुर्ग दादी दो लाठियों के सहारे किसी तरह चलती हुई आई और वोट डाला। व्हीलचेयर होती तो भी कोई फायदा होने वाला नहीं था क्योंकि यहां रैंप पर लोहे की भारी जाली डालकर उसे बंद किया गया था। उधर, रियां बड़ी पंचायत समिति के अति संवेदनशील बूथ बिजाथाल में पुलिसवाले अति संवेदनहीन नजर आए। एक कुर्सी पर अपनी गनें रखकर आराम से चाय-नाश्ता करने में लगे रहे। जिस पुलिसकर्मी की ड्यूटी परिसर के गेट पर थी, उसने ज्ञानार्थ प्रवेश वाले खंभे के पास लाठी टिकाई और हाथ पीछे बांधकर घूमता रहा। उसे लाठी पर पूरा भरोसा था, जैसे ही कुछ गड़बड़ होती तो लाठी अपने-आप सेवार्थ प्रस्थान के कार्य में जुट जाटी। लाठी के आस्था का आलम ये कि अंदर बरामदे में कुर्सी पर बैठे पुलिसवाले ने अपनी टोपी उतारकर लाठी को पहना दी। 4. चलते-चलते.. बात नागौर की है। दो बार के विधायक सुखराम नेड़तिया का राजनीति से मन नहीं भरा। ऐसे में पंचायत चुनाव में उतर गए। गांव में घूम-घूमकर वोट मांगने लगे। गांव सभा में फैंटे बंधवाने लगे। चार लोगों को जुटाकर जय-जयकार कराने लगे। मेड़ता में विधायक लक्ष्मण कलरू को लेकर सुखरामजी एक गांव सभा में पहुंचे। दोनों शायद गलत मुहूर्त में निकले थे। गांव सभा में रिटायर्ड जज हरसुखराम पूनिया भी पहुंच गए। वे पूर्व विधायक और विधायक को खरी-खरी सुनाने लगे। दोनों माननीय गटक-गटक सुनने लगे। बात इतनी खरी कि प्रतिकार भी नहीं कर सके। तो रिटायर्ड जज साहब ने विधायक जी की तरफ तर्जनी उठाकर उलाहना देना शुरू किया। बोले-विधायकजी से पूछो पूर्व विधायक दो बार चुने गए, इन्होंने गांव के लिए क्या किया? गांव में कंपाउंडर भी नहीं बैठता। मेड़ता में फसल मुआवजे की घोषणा हुई थी, एक टका भी आज तक आया क्या? आप गांव में आए आपका स्वागत है लेकिन आपने गांव का नाश कर दिया। फिर चौड़े होकर घूमते हो। दो बार भारी मतों से जीते थे। लक्ष्मण जी को 3 साल हो गए। यहां सड़क बनी क्या? स्कूल क्रमोन्नत हुआ क्या? कंपाउंडर बैठा क्या? एक काम बता दो आप लोगों ने किया हो। मुंह लटकाकर आ जाते हो वोट लेने और गांव वाले आंख बंद करके आपको वोट दे देते हैं। आप तो गांव वालों को गुलाम समझो। बताओ कि इन्होंने आपको जिताया नहीं क्या? फिर आपका आउटपुट क्या है? फालतू बात करते हो, वोट मांगने आ जाते हो। आपके दिल में पीड़ा नहीं होती कि जो लोग हमें वोट देते हैं उनके लिए कुछ कर दें? विधायक-पूर्व विधायक को सांप सूंघ गया। बाकी लोग भी साइलेंट रहे। इस बीच एक ग्रामीण बोला-बाकी काम तो छोड़ो, यहां तो नरेगा में भी काम नहीं मिलता। इनपुट सहयोग- काका सिंह (श्रीगंगानगर), विश्नाराम सैनी (रियांबड़ी, नागौर) वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।
