सीनियर आईएएस शिखर अग्रवाल को बुधवार देर रात एपीओ कर देना सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश नहीं है। पहली बार उन पर ऐसी गाज गिरी है। इससे पहले 33 साल की नौकरी में उन्हें कभी एपीओ नहीं किया गया था। कार्मिक विभाग ने आदेश में हालांकि प्रशासनिक कारण लिखा है, लेकिन असली वजह दैनिक भास्कर का वह खुलासा है, जिसमें उनके परिवार की ओर से ढाई साल में एक ही कंपनी से 40 विला और कॉटेज खरीदने की बात सामने आई थी। जब कोई अधिकारी उद्योग, निवेश और रीको जैसे पदों पर बैठा हो और उसी दौरान उसके परिवार की इतनी बड़ी प्रॉपर्टी डील हो जाए तो यह सिर्फ निजी लेन-देन नहीं रह जाता। अधिकारी का काम जनता का हित देखना होता है। अगर वही अधिकारी अपने और अपने परिवार के फायदे की तरफ कदम बढ़ाए तो सवाल उठना लाजमी है। यह प्रकरण केवल 40 विला की खरीद का नहीं है। सार्वजनिक पद की मर्यादा और हितों के टकराव का सवाल है। परिवार ने एक ही कंपनी से संपत्तियां खरीदीं और फिर उन्हें उसी कंपनी को लीज पर दे दिया। जिस कंपनी से ये डील हुई, उसे निवेश प्रोत्साहन योजना का लाभ भी मिला। यह अपने आप में किसी गलत काम का सबूत नहीं है, लेकिन निजी सौदे और सरकारी फैसलों के बीच संभावित संबंध का शक जरूर पैदा करता है। कुछ सवालों के जवाब मिलना अभी बाकी है। कॉटेज और विला की कीमतें बाजार के हिसाब से थीं या नहीं? लीज की शर्तें कैसे तय हुईं? संपत्ति की रजिस्ट्री और कंपनी को मिलने वाले फायदे (निवेश प्रोत्साहन) के समय में इतनी निकटता क्यों है? शिखर अग्रवाल को खुद आगे आकर इन सवालों का साफ जवाब देना चाहिए। सरकार की देर रात की कार्रवाई यह संकेत देती है कि अब ऐसे मामलों में चुप्पी नहीं चलेगी। भजनलाल सरकार का क्लियर मैसेज है कि वो जीरो टॉलरेंस नीति अपनाएगी, लेकिन असली जवाबदेही तभी पूरी होगी जब जांच पूरी हो और सच्चाई सामने आए। लोकतंत्र में बड़ा पद नैतिकता से मुक्ति नहीं देता, जिम्मेदारी बढ़ाता है। इस पूरे मामले को कुछ प्रश्नों में आसानी से समझते हैं… सवाल-1. पति-पत्नी दोनों बड़े पद पर हैं। क्या उन्होंने गलत तरीके से संपत्ति खरीदी?
दोनों पति-पत्नी देश की सबसे बड़ी सरकारी सेवा में हैं। उनकी तनख्वाह अच्छी होती है और प्रॉपर्टी खरीद सकते हैं। शिखर अग्रवाल की तरफ से यह भी कहा गया कि खरीद पूरी तरह कानूनी है और इसकी जानकारी इनकम टैक्स रिटर्न और IPR में दी गई है। इस खरीद की लागत और रिटर्न ने कई सवाल खड़े कर दिए। 40 विला और कॉटेज करीब 6 करोड़ 16 लाख रुपए में खरीदे गए और उन्हें सालाना 1 करोड़ 80 लाख रुपए में वापस लीज पर दे दिया गया। लीज भी उसी कंपनी को दी गई, जिससे खरीदा गया था। हर साल करीब 30 फीसदी रिटर्न का यह गणित आसानी से पच नहीं रहा। इसी बीच यह भी सामने आया कि रिसॉर्ट वाली कंपनी को विला खरीदने के आसपास सरकार की तरफ से निवेश प्रोत्साहन योजना में रियायतें मिलीं। इससे यह सवाल उठा कि कहीं यह हितों का टकराव तो नहीं है। सरकार ने अंदरखाने सूचनाएं जुटाईं तो सवाल उठे। सूत्रों के अनुसार बात दिल्ली तक पहुंची और बुधवार देर रात एपीओ का आदेश आ गया। हालांकि अंतिम बात तो जांच के बाद ही कही जा सकती है। सवाल-2. सरकार की कार्रवाई के क्या मायने हैं? और सिर्फ शिखर पर ही क्यों?
1993 बैच के सीनियर आईएएस शिखर अग्रवाल राजस्थान के सबसे ताकतवर अफसरों में शुमार हैं। सरकार चाहे किसी की भी रही हो, ज्यादातर समय बड़े विभागों का जिम्मा उनके पास ही रहा। वे मौजूदा मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के ACS भी रह चुके हैं। वे ब्यूरोक्रेसी के बड़े पदों पर रहे। ऐसे में सरकार ने जांच से पहले यह साफ कर दिया कि वह अपनी छवि पर कोई आंच नहीं आने देगी। पत्नी IPS हैं, लेकिन सीधे तौर पर जवाबदेही वाला पद शिखर के पास था। ऐसे में कार्रवाई उन पर हुई। सवाल-3. क्या शिखर अग्रवाल का यह विवाद नया है?
नहीं। शिखर अग्रवाल पहले भी विवादों में रहे हैं। साल 2016 में जब वे जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) के कमिश्नर थे, तब राजमहल पैलेस होटल के बाहर अतिक्रमण हटाने को लेकर विवाद हुआ था। बाद में मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के ACS रहते हुए तत्कालीन मुख्य सचिव सुधांश पंत से उनकी तनातनी की खबरें भी आई थीं। माना जाता है कि उसी के चलते शिखर की मुख्यमंत्री कार्यालय से और पंत की राजस्थान से विदाई हुई थी। सवाल-4. विपक्ष इस मामले में क्यों चुप है?
शिखर अग्रवाल किसी भी सरकार में अच्छे पदों पर रहे। यह खरीद-फरोख्त दोनों सरकारों के समय हुई है। कई विवादों के बाद भी उनकी काम करने की क्षमता की तारीफ होती रही है। विरोध करने वाले भी मानते हैं कि उनका फाइल निपटान बहुत तेज है। सवाल-5. IPR में सूचना भरने के बाद भी पद से क्यों हटाया?
अचल संपत्ति विवरण (IPR) भरना अनिवार्य है। शिखर अग्रवाल ने कहा कि उन्होंने जानकारी दी है और पत्नी के IPR में अंतर अटैचमेंट की गलती से दिख रहा है, लेकिन जनता का भरोसा कम हुआ है। अधिकारी, राजनेता या सरकार- ये सब जनता के टैक्स के पैसे के ट्रस्टी हैं। तकनीकी खामी या अधूरा खुलासा विश्वास को कमजोर करता है। जांच से ही साफ होगा कि बात कितनी सही है। होना क्या चाहिए?
राजस्थान ही नहीं, देश के अन्य जगहों पर भी अफसरों के निजी संपत्ति के विवरणों पर नजर रखनी चाहिए। IPR सिर्फ औपचारिकता नहीं है। सीनियर अफसरों के संपत्ति विवरण में खामियां या अधूरा खुलासा विश्वास घटाता है। जब कोई अफसर आर्थिक पोर्टफोलियो संभाले, तो उसके और परिवार के निवेश पर सख्त नियम होने चाहिए। निजी संपत्ति और सरकारी फायदे का संयोग बार-बार विश्वास का संकट पैदा करता है। पद की गरिमा तभी बनी रहती है जब अधिकारी संदेह से ऊपर उठे। पारदर्शी जांच, संपत्ति विवरण में सुधार और हितों के टकराव पर साफ नियम की जरूरत है। उम्मीद की जाती है कि अफसर को अपने और अपने परिवार के फायदे से दूर रहना चाहिए। शिखर अग्रवाल के मामले में यही बात छूटी हुई नजर आ रही है। … ये खबर भी पढ़ें… IAS शिखर, IPS पत्नी प्रशाखा के परिवार के 40 विला-कॉटेज:ढाई साल में एक ही कंपनी से खरीदे, दोनों बेटों और सास-ससुर के नाम भी प्रॉपर्टी विला-कॉटेज खरीद मामला,IAS शिखर अग्रवाल को सभी पदों से हटाया:IPS पत्नी के साथ खरीदी थी प्रॉपर्टी, फिर उसी कंपनी को लीज पर दी
