September 10, 2026

नमस्कार, पाप के घड़े को लेकर राजधानी में विरोधियों ने खूब हल्ला बोला, उधर कोलाहल से दूर पूर्व मुखिया जी को चराग वाली शायरी सुना दी गई। चुनावी मौसम में एक ऐसे भाजपा कार्यकर्ता सामने आए जिनका नाम विरोधियों को पसंद नहीं आएगा और ‘करंट वाली बसों’ के रुझान आ रहे हैं। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. ‘पाप का घड़ा’, वंदेमातरम और शायरी.. निकाय और पंचायत चुनाव के मौसम में विरोधियों में जोश भरा है। ऐसे में कॉकरोचों ने स्कूलों का मुद्दा छेड़ा। कोढ़ में खाज वह सरकारी लेटर भी रहा जिसमें ‘वीडियोशूट की परमिशन’ का जिक्र था। मानसून सत्र सदन के अंदर से ज्यादा बाहर चला। विरोधी खेमा ‘पाप का घड़ा’ लेकर पहुंचा। हाथों में पोस्टर। जूली जी ने घड़े को उठाया और बोले- यह फलां पार्टी के पाप का घड़ा है। फिर साथियों ने एक एक मुद्दा गिनाते हुए पर्चों से घड़ा भर दिया। चीफ साहब ने ऐलान किया- पाप का घड़ा भर चुका है। इसके बाद घड़ा आसमान की तरफ उठाकर जमीन पर दे मारा गया। चुनावी दौर में पाप के घड़ों की बाढ़ आ जाती है। यूं तो यह घड़ा भरने की मियाद 5 साल है। इसके बाद पब्लिक ऑटोमैटिक घड़ा ही चेंज कर देती है। ऐसे में जनता भी जानती है मिड टर्म में फोड़ा गया घड़ा असली नहीं है। एक पत्रकार ने विधायक बाबाजी से सवाल किया- शिक्षा के मुद्दे पर कांग्रेस प्रदर्शन कर रही है, क्या कहेंगे? बाबाजी ने सवाल के उड़ते तीर का रुख मोड़ते हुए कहा- कांग्रेस तो चाहती है कि इस देश में वंदेमातरम बंद हो जाए। बाबाजी ने ‘जाना था जापान पहुंच गए चीन’ नियम से सवाल का जवाब दिया। उधर, इस कोलाहल से दूर ‘जादूगर जी’ को किसी सज्जन ने रोका। दूसरे सज्जन की ओर इशारा कर कहा- ये आपको शायरी सुनाएंगे। पूर्व मुखियाजी सुनने लगे। शायर साहब ने कहा- दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत, ये एक चराग हजार आंधियों पे भारी है..। चराग की उपमा पाकर जादूगर महोदय मुस्कुराए और शाबाशी देकर आगे बढ़ गए। कुछ दिन पहले ही मुख्यमंत्रीजी ने कहा था- उस खेमे में पहले दो का कॉम्पिटिशन था। अब चार का है। चर्चा है कि निशाना सटीक बैठा है। चराग वाली शायरी से जादूगर को दुष्यंत कुमार याद तो आए होंगे, जिन्होंने लिखा है- कहां तो तय तो चरागां हरेक घर के लिए, कहां चराग भी मयस्सर नहीं शहर के लिए। 2. नाम कांग्रेस, समर्थक भाजपा के.. विलियम शेक्सपीयर के नाटक रोमियो और जूलियट में प्रसिद्ध कथन है- नाम में क्या रखा है? यह सवाल रोमियो से करते हुए जूलियट ने कहा था- गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो, उसकी खुशबू नहीं बदलती। गले में भगवा गमछा डाले एक महोदय रास्ता खराब होने की बात कह रहे थे। दावा कर रहे थे कि इंसान तो उस रास्ते से निकल ही नहीं सकता। पत्रकार खोद-खोद कर सवाल पूछे जा रहा था। बात की हालत भी सड़क जैसी ही हो चुकी थी। पत्रकार ने गमछा देख अंदाजा लगा लिया कि बंदा कि पार्टी का समर्थक है। महोदय भी पत्रकार की मंशा भांप गए। बोले- देखो जी, मैं भाजपा का कार्यकर्ता हूं, मेरा नाम कांग्रेस है। कांग्रेस? पत्रकार चौंका। कांग्रेस महोदय ने समझाया- जब मैं पैदा हुआ था तब मेरा नाम मांगीलाल था। लेकिन फिर माता पिता ने लाड़ से नाम कांग्रेस रख दिया। अब आधार में भी यही नाम है- कांग्रेस। कांग्रेस महोदय ने पत्रकार को आगाह किया- नाम जानकर ये मत समझना कि मैं कांग्रेसी हूं, मेरा नाम ही कांग्रेस है, बाकी मैं भाजपा का आदमी हूं। भंवरगढ़ (बारां) से आया हूं। कांग्रेस महोदय ने शेक्सपीयर महोदय के विजन को धोबीघाट पर पछाटे मारकर धो दिया। नाम में बहुत कुछ रखा है। अगर इन्हें इनकी पार्टी टिकट दे दे, तो रिजल्ट आने पर कुछ इस तरह की चर्चाएं होंगी- चुनाव में कांग्रेस ने कांग्रेस को हराया। कांग्रेस की जीत पर भाजपा ने जश्न मनाया। 3. चलते-चलते.. एक तरफ विकास के नाम पर उद्योग-धंधे, फैक्टियां, चिमनियां, धूल-धुआं, कचरा, कोलाहल, केमिकल है। जो पर्यावरण को खत्म करता जा रहा है। दूसरी तरफ पर्यावरण बचाने के लिए पौधारोपण, सौर प्लांट, पवन चक्की, प्लास्टिक बैन और इलेक्ट्रिक वाहन जैसे प्रयोग किए जा रहे हैं। हमें पर्यावरण को खत्म भी करना है और पर्यावरण को बचाना भी है। दरअसल अब तक पर्यावरण ने हमें बचा रखा है। हम तो पर्यावरण को खत्म ही कर रहे हैं। इलेक्ट्रिक बसें जोधपुर पहुंच चुकी हैं। पहली बार एक ग्रामीण यात्री बस में बैठा। अब तक पावटा से बनाड़ के सफर के दौरान उसका अनुभव जीपों, प्राइवेट बसों और जुगाड़ों का रहा होगा। आधुनिक बस में बैठकर वह धन्य हुआ। बिना शोर वाली खुली-खुली बस। बस में एयर कंडीशन। खुश होकर यात्री ने वीडियो बनाया। कहा- सरकार ने करंट वाली बस बनाई हैं। पावटा से बनाड़ का किराया 10 रुपए है और बस AC है। दूसरी तरफ अजमेर के नसीराबाद में चलाई गई इलेक्ट्रिक बस से यात्री तंग हो गए। बस 6 बार रुकी। बंद पड़ गई। ड्राइवर-कंडक्टर को समझ ही नहीं आ रहा कि हो क्या गया। यात्री बार-बार उतरकर सड़क पर खड़े हो जाते। परेशान होकर टिकट का पैसा ही मांगने लगे। एक यात्री बोला- हम पर ही ट्रायल करना था क्या? पूरी तरह चेक करते फिर चलाते। तकनीक समझने में भले वक्त लगे लेकिन करंट वाली बसें हैं इको फ्रेंडली। धीरे-धीरे हमको इनकी और इनको हमारी आदत हो जाएगी। इनपुट सहयोग- जयदीप पुरोहित (जोधपुर). रिषभ सैनी (जयपुर), भरत मूलचंदानी (अजमेर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब मंगलवार सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।

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