दादा ने खेती के लिए मोटिवेट किया। कहते थे- सभी नौकरी करेंगे तो खेती कौन करेगा? नौकरी छोड़कर खेती करना भी आसान नहीं था। ऑर्गेनिक और नेचुरल फॉर्मिंग के साथ इनके बाजार को देखा और समझा। पहली बार पपीते के पौधे लगाए, लेकिन मेहनत के अनुसार मुनाफा नहीं मिला। इसके बाद पूरा मॉडल बदलने की कोशिश की। फसल के साथ पशुपालन जोड़ा, उपज का वैल्यू एडिशन किया और सीधे ग्राहकों तक पहुंच बनाई। आज 200 लोगों की किचन में आटा, फल-सब्जियां, घी-तेल पहुंचा रहे हैं। इसके अलावा पौधों से मिलने वाली मेडिसन भी सप्लाई कर रहे हैं। नेचुरल फॉर्मिंग के मॉडल से कारोबार करीब 7 करोड़ रुपए के टर्नओवर तक पहुंच गया है। आखिर ऐसा क्या किया कि खेती में शुरुआती झटकों के बाद किसान नीतेश यादव (35) ने इसे कमाई के मॉडल में बदल दिया? म्हारे देस की खेती में इस बार बात कोटपूतली-बहरोड़ के किसान की … पावटा के गोवर्धनपुरा के रहने वोले नीतेश यादव ने MBA किया। पिता महेश चंद (63) और मां श्यामवती देवी दोनों सरकारी टीचर हैं। छोटा भाई, बहन भी सरकारी नौकरी में हैं। दादा पटवारी थे। पढ़ाई के दौरान उन्होंने देखा – लोग ऑर्गेनिक के नाम पर उत्पादों को महंगे दामों पर बेचते हैं, लेकिन ग्राहकों के लिए इन उत्पादों की शुद्धता पर भरोसा करना मुश्किल होता है। यहीं से नीतेश को लगा कि किसान को ऐसा मॉडल तैयार करना चाहिए, जिसमें ग्राहक खेत से लेकर घर तक उत्पाद की शुद्धता पर भरोसा कर सके। बिजनेस के लिए पैसे चाहिए थे, इसलिए शादी के बाद बैंक की नौकरी की नीतेश यादव बताते हैं- खेती को बड़े स्तर पर शुरू करने के लिए बिजनेस की तरह काम करने का फैसला किया। इसके लिए पैसे की जरूरत थी। लेकिन बिना अपनी काबिलियत दिखाए बैंक और घर से रुपए मिलना मुश्किल होता है। इसलिए शादी के बाद उन्होंने बैंक की नौकरी की, लेकिन 6 महीने बाद नौकरी छोड़ दी। पहली बार पपीते लगाए, खेती में मुश्किलों को अंदाज हुआ अप्रैल 2019 में नीतेश ने खेती की शुरुआत की। एक हेक्टेयर जमीन में 2200 पपीते के पेड़ लगाए। साथ में इंटरक्रॉप के तौर पर टमाटर लगाया। टमाटर लगाने की वजह यह थी कि इसकी फसल जल्दी तैयार हो जाती है और पपीते की फसल आने तक किसान को दूसरी फसल से आमदनी मिल सकती है। हालांकि पपीते की फसल तैयार होते-होते पाला पड़ गया। नीतेश बताते हैं कि पपीते का पेड़ करीब तीन साल तक चल सकता है, लेकिन राजस्थान के मौसम में इससे लगातार उत्पादन लेना काफी मुश्किल होता है। दो साल बाद ही उन्होंने पपीते के पेड़ हटा दिए। राजस्थान में पपीते के लिए वैसा वातावरण नहीं बन पाता, जैसा इस फसल को चाहिए। कोरोना का समय अवसर की तरह आया, फिर परिवार ने दिया साथ नीतेश ने बताया कि बेल वर्ग की फसलों में भी दिक्कत आती थी। इसलिए शुरुआत में उन्होंने हार्ड क्रॉप यानी ऐसी फसलें भी कीं, जिनमें मौसम का असर अपेक्षाकृत कम हो, जैसे लहसुन और प्याज। इसी दौरान कोरोना का दौर आया, जिसे उन्होंने खेती के लिए एक अवसर की तरह लिया। कोरोना के दौरान नीतेश ने एक एकड़ में चप्पल डिंडा लगाया। यह करीब 35 दिन में तैयार हो जाता है और करीब 25 दिन तक इसकी हार्वेस्टिंग होती है। पहली बार उन्होंने ड्रिप, मजदूरी और बीज का खर्च निकालने के बाद करीब 50 हजार रुपए बचाए। इससे उनका खेती पर भरोसा बढ़ा और इसके बाद उन्होंने सब्जियों की खेती का क्षेत्र बढ़ाना शुरू किया। इसके बाद नीतेश ने खेती के साथ डेयरी को भी जोड़ा। डेयरी से उन्हें सपोर्ट मिला और इसके बाद परिवार ने भी उनके काम में साथ देना शुरू किया। 2020 में 60 साहीवाल गायों से शुरू किया पशुपालन नीतेश का कहना है कि गाय के बिना ऑर्गेनिक खेती का मॉडल पूरा करना मुश्किल है। एक हेक्टेयर जमीन के लिए एक गाय पर्याप्त हो सकती है। 2020 में 60 साहीवाल गायों से पशुपालन शुरू किया। एक गाय एक दिन में करीब 16 लीटर दूध देती है। कम दूध में भी अच्छी मात्रा में घी निकलता है। गायों से मिलने वाले गोबर से वर्मी कंपोस्ट तैयार होता है, जबकि दूध और घी भी खेती के मॉडल का हिस्सा हैं। 30 बीघा जमीन में 15 बीघा पर मॉडल फॉर्म नीतेश के पास कुल 30 बीघा जमीन है। इसमें 15 बीघा में मॉडल फॉर्म तैयार किया है। यहां सीजन के हिसाब से अलग-अलग फलों के पौधे और करीब 80 वैरायटी के मेडिसिनल प्लांट लगाए हैं। बाकी 15 बीघा में परंपरागत खेती करते हैं। इसमें बाजरा, गेहूं, जौ, ज्वार, दालें, सरसों, राई आदि फसलें शामिल हैं। पढ़िए… कैसे किसान ने कमाई का मॉडल तैयार किया ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट लेकर खेती को तकनीक से जोड़ा नीतेश बताते हैं कि खेती को तकनीक के साथ करना चाहिए। इसके लिए उन्होंने राज्य बीज और प्रमाणन एजेंसी से सर्टिफिकेट लिया। संस्था की टीम ने उनके खेत के पानी और मिट्टी की जांच की। मिट्टी केमिकल फ्री होने के बाद प्रमाण-पत्र दिया जाता है। उनका कहना है कि केमिकल वाली जमीन को सही स्थिति में लाने में काफी समय लगता है। फिटकरी और गोमूत्र के इस्तेमाल से केमिकल पार्टिकल्स खत्म करने की कोशिश की जाती है। किसान अपने नाम से फर्म बनाकर बाजार तैयार करे नीतेश का कहना है कि इसके बाद अपनी फर्म बनानी चाहिए, जिससे उसी नाम से उत्पादों के लिए बाजार तैयार किया जा सके। खेत से तैयार होने वाले उत्पादों का वैल्यू एडिशन करना चाहिए। वे उदाहरण देते हैं कि गेहूं से आटा, आंवले से कैंडी, अचार और मुरब्बा बनाया जा सकता है। मेडिसिनल प्लांट से तैयार उत्पादों को डिहाइड्रेट यानी सुखाकर पाउडर बनाया जा सकता है और अलग-अलग तरीके से बेचा जा सकता है। कच्चा माल नहीं, तैयार उत्पाद बेचने पर बढ़ती है वैल्यू नीतेश के मॉडल में फसल को सीधे बाजार में बेचने के बजाय उसका वैल्यू एडिशन किया जाता है। गेहूं से आटा बनाने के लिए लो-RPM मशीन का इस्तेमाल करते हैं। मसालों को ओखली-मूसली से पीसकर तैयार किया जाता है, ताकि जरूरी न्यूट्रिएंट खत्म न हों। सरसों से तेल निकालने के लिए तेल निकालने की मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। सब्जियों, फलों और मसालों को सोलर ड्रायर में सुखाकर लंबे समय तक रखने लायक बनाया जाता है। जरूरत के अनुसार इनका पाउडर भी तैयार किया जा सकता है। इससे किसान की उपज सिर्फ कच्चा माल नहीं रहती, बल्कि तैयार उत्पाद बन जाती है और उसकी वैल्यू बढ़ती है। 200 घरों की रसोई तक पहुंचा रहे खेत का सामान नीतेश बताते हैं कि हरी सब्जियां और फल सीधे ग्राहकों तक भी पहुंचाते हैं। करीब 200 लोगों की रसोई में उनके खेत में तैयार आटा, तेल और मसाले सप्लाई किए जाते हैं। इसके लिए उत्पाद खरीदने वाला ग्राहक खेत पर पहुंचकर यह भी देख सकता है कि खेत में फसल कैसे तैयार हो रही है और वहां से पूरा सामान उसकी रसोई तक कैसे पहुंचता है। अब समझें… नेचुरल खेती में बायो रिसोर्स कैसे काम करते हैं नीतेश बताते हैं- बायो रिसोर्स का मतलब ऐसे संसाधनों से है, जो प्राकृतिक तरीके से मिलते हैं और जिन्हें खेती में दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। ऑर्गेनिक और नेचुरल फार्मिंग को समझना होगा। उनके अनुसार ऑर्गेनिक खेती को केमिकल फ्री खेती कहा जा सकता है, लेकिन शरीर की जरूरत के सभी न्यूट्रिएंट मिल पाना जरूरी नहीं है। इसलिए नेचुरल तरीके की तरफ जाना जरूरी है। नेचुरल खेती के लिए पशुपालन जरूरी नीतेश यादव बताते हैं – पशुपालन से मिलने वाले हर संसाधन को खेती में वापस इस्तेमाल करने की कोशिश की जाती है। गोबर के कंडे और देशी घी का इस्तेमाल हवन या अग्निहोत्र में भी किया जाता है। इससे निकलने वाला धुआं गौशाला और आसपास के वातावरण में मक्खी-मच्छरों को दूर रखने में मदद करता है। कंडे और घी जलने के बाद बची राख में पोटैशियम, कैल्शियम जैसे खनिज हो सकते हैं। इसे उचित मात्रा में मिट्टी या कंपोस्ट में मिलाया जा सकता है। हालांकि राख का इस्तेमाल करते समय मिट्टी की स्थिति और मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है, क्योंकि ज्यादा राख डालने से मिट्टी का pH बढ़ सकता है। इसके अलावा गोबर से बायोगैस और केंचुओं से जैविक खाद भी तैयार की जाती है। खेत के संसाधनों को दोबारा खेत में इस्तेमाल करने का मॉडल नीतेश बताते हैं – खेत से मिलने वाला चारा और फसल अवशेष पशुओं के काम आता है। गाय से मिलने वाला गोबर, गोमूत्र और छाछ खेती के काम आते हैं। छाछ से वे षड़रस तैयार करते हैं, जिसका इस्तेमाल पत्तों में होने वाली बीमारियों को ठीक करने के लिए करते हैं। इसके लिए एक किलो गुड़, तीन किलो फल और 10 लीटर पानी का इस्तेमाल किया जाता है। इस अनुपात में अलग-अलग घोल तैयार किया जाता है। आंवला और बीलपत्र में पोटैशियम-कैल्शियम जैसे तत्व होते हैं। उनके अनुसार ये पोषण क्षमता बढ़ाने और फसलों में बीमारियों को रोकने में मदद करते हैं। नेचुरल फार्मिंग में फसलों में रोग आने से पहले रोकथाम हो जाती है। — खेती किसानी से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए…. 7 हजार में किसान की 5 करोड़ की ‘ग्रीन एफडी’:अरणी को जंगली पौधा समझना भूल, इसी मेडिसिन प्लांट के साथ लगाए चंदन के 50 पौधे राजस्थान में टोंक जिले के किसान ने सात हजार रुपए में 5 करोड़ रुपए की FD करवाई है। ये FD बैंक में नहीं, उनके खेत में खड़े सफेद चंदन के 50 पौधे हैं। पूरी खबर पढ़िए
